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क्षितिज से अनंत तक

बांटा है समय ने,कुछ ऐसी गहराई से;
दो छोर के बीच का सफर मेरा
मानो घिर गया है धुंद और परछाई से।

है अलग अलग सा अहसास बहुत;
कभी पीड़ा,कभी अल्हाद बहुत;
है शिखर पर भावनाओं की, खड़ी हो सोच रही;
क्षितिज सा और अनंत सा रहा हर मेरा अनुभव;
अंतराल के खालीपन ने अनंत से मिला दिया।

हाथो में थी समय की गांठ;
फिसल गई शायद ढीली हो चली थी;
खो कर भी लगा सब पाया है;
क्या कभी क्षितिज या अनंत को कोई पकड़ पाया है?

Picture by Sweet Ice Cream Photography (Unsplash)

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