क्षितिज से अनंत तक

बांटा है समय ने,कुछ ऐसी गहराई से;
दो छोर के बीच का सफर मेरा
मानो घिर गया है धुंद और परछाई से।

है अलग अलग सा अहसास बहुत;
कभी पीड़ा,कभी अल्हाद बहुत;
है शिखर पर भावनाओं की, खड़ी हो सोच रही;
क्षितिज सा और अनंत सा रहा हर मेरा अनुभव;
अंतराल के खालीपन ने अनंत से मिला दिया।

हाथो में थी समय की गांठ;
फिसल गई शायद ढीली हो चली थी;
खो कर भी लगा सब पाया है;
क्या कभी क्षितिज या अनंत को कोई पकड़ पाया है?

Picture by Sweet Ice Cream Photography (Unsplash)

Please follow and like us:
error

2 thoughts on “क्षितिज से अनंत तक

  1. So coool! 🙂
    Looking forward to reading more of your poems aunty ! More power to you!!

    1. Thanks Disha.

Leave a Reply

error: Protected content
%d bloggers like this: