Art Hindi Poems Literature Poems

रंजिशे ए जिंदगी

जिंदगी की आज कुछ तहकीकात की;
कुछ पुराने पन्नों की जांच पड़ताल की।

आदतन है ले बैठा था कलम;
स्याही ने गिर कर हकीकत पन्नों पर डाल दी।

क्यों उठे धुएं से परछाई बना रहे थे?
जिंदगी की हवा ने तो बनावट उधार दी।

हम गले मिले?
या गालों से गाल टकराएं;
खोखली सी हवा में वो गर्मी कहां से लाएं?

कमी है यहां कही प्यार कि;
हंसी भी हंस रहे शायद उधार की।

आहट और कदमों कि हलचल का मुआयना करें;
जिन्दगी की रेत पर पदचाप से पड़े;

तहकीकात में ना जाने क्या बाकी रह गया;
पन्नों पे जो था धुंधला सा दिख रहा;
ना हाथों को पकड़ा,ना गालों पे ताल दी;
जिंदगी तुझसे रूबरू होने मैं सदिया गुज़ार दीं।

Picture by Fancycrave (Unsplash)

Please follow and like us:
error

Leave a Reply