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तन्हा


ख्वाबों को हक़ीक़त,
समझने लगी,
तब से परेशां,
मैं रहने लगी••••••!
कुछ नहीं,
बंद पलकों के परे
स्याह अंधेरों के सिवा,
उन्हीं स्याही से,
रंगीन सपने,मैं
उकेरने लगी.•••••••!!
क्या तस्वीर बनती,
क्या बनाये जा रही हूँ,
खामखाँ लकीरें,
खीचनें लगी•••••!!!
हांथ खाली
न रंग,न कलम
फिर भी किस्से कई
मैं बनाने लगी••••••!!!!
तन्हा राहों की
मैं तन्हा राहगीर,
अपनी तन्हाई से,
इश्क़ मैं करने लगी••••••!

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